Tuesday, February 27, 2024
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असहयोग आंदोलन/नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट (1920-1922)

नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन (1920-1922) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण चरण था, जो महात्मा गांधी द्वारा नेतृत्व किया गया था। इस मूवमेंट का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक अशांति पूर्ण, शांतिपूर्ण आंदोलन के माध्यम से भारतीय लोगों को समृद्धि और स्वतंत्रता की दिशा में जागरूक करना था।

यह मूवमेंट रोली शास्त्री के अच्छे अनुयायीयों द्वारा शुरू हुआ था जो जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) के खिलाफ आयोजित किया गया था। गांधी ने इसे एक नये स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में बदल दिया और इसे “नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट” कहा गया  जिसे असहयोग आंदोलन के नाम से भी जानते हैं।

 

मूवमेंट के कुछ मुख्य तत्व थे:

  1. स्वदेशी आंदोलन: इस मूवमेंट में भारतीय वस्त्र, खादी, और अन्य स्वदेशी उत्पादों का प्रचार-प्रसार किया गया और बाहरी वस्तुओं के बहिष्कार का पुनर्निर्माण किया गया।
  2. नॉनकॉऑपरेशन: गांधी ने लोगों से ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग न करने की कड़ी आपत्ति करने के लिए कहा और उन्हें अपनी उपयोगिता को बढ़ाने के लिए अधिकृत करने की प्रेरणा दी।
  3. हार्टाल और आंदोलन: भारत में विभिन्न क्षेत्रों में हार्टाल, प्रदर्शन और आंदोलन हुए जिसमें लाखों लोग भाग लेते थे।
  4. जलौसी यात्रा: इस मूवमेंट के अंतर्गत “जलौसी यात्रा” की गई, जिसमें भिक्षुकों ने शांतिपूर्ण रूप से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अभियान चलाया।
  5. छावनी बचाओ आंदोलन: 1921 में मालबार में हुए छावनी बचाओ आंदोलन में किसानों ने अपनी भूमि के खिलाफ विरोध प्रकट किया और इसमें नागरिक सत्याग्रह के रूप में शामिल हो गए।

हालांकि, 1922 में चौरी चौरा हत्याकांड के बाद गांधी ने मूवमेंट को विराम देने का निर्णय किया और नॉन-कॉऑपरेशन आंदोलन/ असहयोग आंदोलन को बंद कर दिया। इसमें हत्याएँ और हिंसा ने मूवमेंट को एक नए रुझान में ले जाने के लिए कहर डाल दिया था।

नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) एक महत्वपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम था जो 1920 से 1922 तक चला। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख पहलुओं में से एक था और महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुआ। इस मूवमेंट का मुख्य उद्देश्य था भारतीय लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सामंजस्यपूर्ण, शांतिपूर्ण आंदोलन के माध्यम से संजागरूक करना और उन्हें स्वतंत्रता की दिशा में जागरूक करना था।

नॉन-कॉऑपरेशन का अर्थ है “सहयोग न करना” या “को-सहयोग नहीं करना”। गांधी ने इस मूवमेंट के तहत भारतीय लोगों से यह कहा कि वे ब्रिटिश साम्राज्य की स्थिति को स्वीकार नहीं करें, उनके साथ सहयोग न करें, और उनके खिलाफ अमृत महोत्सव तक अपनी सामरिकता बढ़ाएं।

मूवमेंट के दौरान विभिन्न प्रकार के प्रतिवादी कदम उठाए गए, जैसे कि स्वदेशी आंदोलन, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, असहयोग और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ जन आंदोलन जैसे। हार्टाल, जलौसी यात्रा, और अन्य शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का भी आयोजन किया गया।

1922 में चौरी चौरा हत्याकांड के बाद, गांधी ने मूवमेंट को विराम देने का निर्णय किया क्योंकि उन्हें विरोधी आंदोलनों में हिंसा का आधार मिला और उन्होंने यह सोचा कि इससे आंदोलन की असली उद्देश्यों की कमी हो रही है।

नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन ने भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डाला और स्वतंत्रता संग्राम की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।

इस मूवमेंट के कुछ मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं:

  1. नागरिक आंदोलन: नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन ने भारतीय समाज में एक महत्वपूर्ण नागरिक आंदोलन की भूमिका निभाई। लोगों को सामूहिक रूप से जोड़ने का अवसर मिला और उन्हें स्वतंत्रता के लिए सामूहिक जिम्मेदारी महसूस होने लगी।
  2. स्वदेशी आंदोलन: इस मूवमेंट ने स्वदेशी आंदोलन को मजबूती से बढ़ाया और लोगों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया। वस्त्र, खादी, और स्वदेशी उत्पादों का प्रचार-प्रसार किया गया।
  3. जनसंघर्ष की भावना: नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन ने जनसंघर्ष की भावना को बढ़ावा दिया और लोगों में राष्ट्रभक्ति की भावना को उत्तेजना किया।
  4. विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार: लोगों को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की दिशा में प्रेरित किया और इसने ब्रिटिश उत्पादों के खिलाफ एक सामूहिक आंदोलन को बढ़ावा दिया।
  5. हिंसाहीन आंदोलन: इस मूवमेंट का मौखिक नारा था “सत्याग्रही असहयोगी बनो” जिससे स्पष्ट होता है कि गांधी ने हिंसाहीन आंदोलन का पुनर्निर्माण किया।
  6. ब्रिटिश सरकार को चुनौती: नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को एक नए स्तर से चुनौती दी और स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया।
  7. चौरी चौरा हत्याकांड: मूवमेंट के अंत में हुए चौरी चौरा हत्याकांड ने गांधी को आंदोलन को विराम देने के निर्णय पर मजबूर किया, लेकिन इसने भी भारतीय समाज को सहयोग और सामूहिक आंदोलन के महत्वपूर्णता का अहसास कराया।

इन प्रभावों के साथ, नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/ असहयोग आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नये चरण में ले जाने में मदद की और लोगों में स्वतंत्रता के प्रति उत्साह बढ़ाया।

नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन (1920-1922) में भारतीय राष्ट्रीय नेतृत्व ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

इस आंदोलन में शामिल होने वाले कुछ प्रमुख नेता निम्नलिखित थे:

  1. महात्मा गांधी: नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन के मुख्य नेता और आंदोलन के आचार्य थे। उन्होंने आंदोलन का आयोजन किया और लोगों को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ अमृत महोत्सव तक स्वतंत्रता के लिए आसन्न करने का आह्वान किया।
  2. जवाहरलाल नेहरु: जवाहरलाल नेहरु ने भी इस मूवमेंट में भाग लिया और गांधीजी के साथ मिलकर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।
  3. सरदार वल्लभभाई पटेल: सरदार पटेल ने भी इस मूवमेंट में भाग लिया और उन्होंने अपनी रूढ़िवादी विचारधारा के कारण अंग्रेजों के साथ को-सहयोग नहीं किया।
  4. अबुल कलाम आज़ाद: आज़ाद ने भी गांधीजी के साथ मिलकर इस मूवमेंट में भाग लिया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाई।
  5. सरोजिनी नायडू: सरोजिनी नायडू ने भी नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और महिलाओं को भी आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।

ये नेता अपनी भूमिका में विभिन्न क्षेत्रों में आंदोलन को मजबूती और व्यापकता प्रदान करने में सक्रिय रूप से योगदान करते रहे।

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