Tuesday, June 25, 2024
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झारखण्ड में आपदा प्रबंधन -भूकंप, बाढ़, सूखा, तड़ित, खनन, हाथियों का आक्रमण ।

ऐसे
दुर्घटनाएँ
   अचानक
घटित हो तथा
  प्रभावस्वरूप
जीवन एवं संपत्ति की व्यापक हानि होती हो
, आपदा कहलाती है। आपदा  प्राकृतिक, आपदा  मानवजनित आपदा में
वर्गीकृत किया जाता।
 
 
प्राकृतिक पर्यावरण  अंतर्गत पर्यावरण  ऐसे घटको को शामिल  है, जिनका  प्रकृति द्वारा  जैसे – वायु, जल, मिटटी, पेड़ – पौधे, जीव – जंतु आदि  अर्थात मानवीय
क्रियाकलापों द्वारा अविक्षुब्द पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण कहलाता है।
 

आपदाएँ दो प्रकार की होती है। 

1.  ऐसी आपदाएँ जो
प्राकृतिक कारणों जैसे – भूकंप
, ज्वालामुखी, चक्रवात, आँधी- तुफान, सुनामी,
सूखा, बाढ़ आदि के कारण घटित हो, प्राकृतिक आपदाएँ है।
 

2. मानवीय कारणों से उतपन्न आपदाएँ
जैसे – युद्ध
, परमाणिवक
घटनाएँ
, रासायनिक
घटनाऐ
, रासायनिक
घटनाएँ आदि शामिल है।
 इसे
सामाजिक आपदा भी कहा जाता है।
 

 

आपदा के भयावहता को देखते हुए आपदाओं के
घटित होने पर कार्रवाई करने
  अपेक्षा के आपदा के कुशल प्रबंधन पर अधिक जोर  दिया जाता है। इसके तहत आपदा के पूर्व ही
प्रबंधन उपायों द्वारा उनसे
  नुकसान को कम करने की  कोशिश की जाती है।  

 

इस दृस्टि से झारखण्ड विभिन्न प्रकार की
प्रकृतिक एवं मानवाजनीति आपदाओं 
के शिकार  तथा इनसे निपटने हेतु आपदा प्रबंधन को
मजबूती प्रदान करना नितांत आवश्यक है।
  इन आपदाओं में भूकंप, बाढ़ ,सूखा चक्रवात, सुनामी के प्रभाव, तड़ित, खनन दुर्घटना, रासायनिक दुर्घटना, औद्योयोगिक दुर्घटना, जंगलों में आग, हथियार का अकर्मण आदि
प्रमुख है।
 

 

भूकंप 

 

भूकंप की दृष्टि से झारखण्ड राज्य को न्यून
जोखिम वाले क्षेत्र में रखा
  सकता है। इसीलिए भूकंप संवेदनशील की दृष्टि से राज्य को जॉन II, III एवं IV  में रखा जा सकता है।  

इसका विवरण इस प्रकार है। 

 

जोन II  के अंतर्गत राज्य के जिलों को रखा गया है
( राँची
, लोहरदगा, खूंटी, रामगढ़. गुमला , पूर्वी सिंहभूम  पश्चिमी सिंहभूम )
आते है।

जोन III के अंतर्गत राज्य के 15 जिले (पलामू, गढ़वा, लातेहार, चातरा ,हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, कोडरमा, देवघर, दुमका, जामताड़ा, गोड्ड़ा, पाकुड़ व साहेबगंज )
आते है।

जोन IV  में गोड्डा तथा साहेबगंज उत्तरी भाग
अवस्थित है
, जो
सर्वाधिक भूकंप प्रभावित क्षेत्र है ।
 

 

 

बाढ़  

झारखण्ड राज्य के 11  जिले बाद की समस्या
से प्रभावित
  साहेबगंज, गोड्डा, पाकुड़ , दुमका, धनबाद, देवघर, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम तथा
हजारीबाग
प्रमुख है।
  

 राज्य
में बाढ़
  कारण
मानसून वर्षा द्वारा नहीं जलस्तर में वृद्धि होना है
 । सोन तथा उत्तरी कोयल
नदी के जलस्तर वृद्धि के कारण
  पलामू,
गढ़वा
तथा लातेहार जिला में भी बाद का प्रभाव होता है। बाढ़
  से  धान की फलो पर
प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है
,
जिसके
फलस्वरूप राज्य की खाद्यान्न व्यवस्था नकारात्मक रूप
  प्रभावित होती है।  कुछ जिले में बाढ़
आपदा का रूप ग्रहण कर लेती 
है  जिसके
कारण मकान सड़क
, पुल
– पुलिया आदि
  क्षतिग्र्स्त
हो जाते है।
  बाढ़
के कारण सर्वाधिक प्रभाव राज्य उत्तरी – पूर्वी क्षेत्रों
  जो  तंत्र से जुड़े  हुए है।  वर्षा के दिनों में
जलस्तर में वृद्धि के कारण रांची
  जमशेपुर जैसे नगरों में सड़को  परवाह प्रारंभ   है जिसके
प्रणामस्वरूप परिवहन व्यवस्था
  दृष्प्रभावा पड़ता है।  साथ ही विभिन्न बीमारियों  पनपने के कारण मानवीय
स्वास्थ्य पर भी
  नकारात्मक
प्रभाव पड़ता है।

 

सूखा 

 

किसी क्षेत्र   वर्षा होने के आधार   इसके तहत सामान्य से 25  प्रतिशत कम वर्षा
होने पर सामान्य सूखा
, 25
-25 
प्रतिशत काम वर्षा  मध्यम  सूखा तथा 50  प्रतिशत काम वर्षा
होने
  सामान्य
सूखा कहा जाता है।
  यदि  किसी क्षेत्र में
सामान्य के
75 
 
कम 
वर्षा
होती है
, तो
यह आपदा का रूप ले लेती है और कई बार
  राज्य के उत्तरी – पश्चिमी हिस्से में
सूखा आपदा का
  का
रूप
  लेती
है
, जिसके
परिणामस्वरूप पलामू
, गढ़वा, लातेहारलोहरदगा जिलों   प्रतिकूल प्रभाव पड़ता
है। राज्य का पलामू जिला सूखा की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील जिला है। वर्ष
2010   झारखण्ड
राज्य गंभीर सूखे से प्रभावित रहा है।
   राज्य  के 24  में से 12  जिले गंभीर सूखे  प्रकोप  इन सभी जिलों में
वर्षा
  अनुपात
औसत वर्षा के
50  प्रतिशत
से
  रहा।  सूखे  आपदा से निपटने हेतु
राज्य
  ,तालाब, डोभा, वाटर शोड  प्रबंधन, उचित फसलो का चयन, मृदा संरक्षण, वृक्षों की  नियंत्रण  की जरुरत है।   संबंधित क्षेत्रके
लोगों को जागरूक
  प्रशिक्षित
करने की आवस्यकता है।
  

 

तड़ित (लइटिंग
)

 

वर्षा के दिनों में चमकने वाली बिजली का
जमीन पर गिरना तड़ित कहलाता है 
 इस कारण झारखण्ड में प्रत्येक वर्ष अनेक  मृत्यु  हो जाती है। साथ ही
इस दुर्घटना में कई मवेशियों की भी मृत्यु हो जाती है। इस आपदा से राज्य के पलामू
, चतरा , लातेहार, गुमला, राँची , गिरिडीह तथा कोडरमा
जिला मुख्य रूप से प्रभावित है।
 

राज्य के श्रीकृष्ण लोक प्रशासन संस्थान
द्वारा इस समस्या
  निपटने
हेतु एक विशेष ट्रेनिंग मॉडयूल का निर्माण किया गया है।
 

इस समस्या से होने वाली जानमाल की हानि
को कम करने हेतु राज्य के लोगो को बचाओ से संबंधित प्रशिक्षण दिये जाने की आवश्कता
है जिसके तहत वर्षा के समय घरों में रहना
, पड़े के निचे नहीं खड़ा होना, बिजली एवं तार के
खंबे से दूर रहना आदि शामिल है।
 

 

खनन दुर्घटना 

 

झारखण्ड राज्य में देश के कुल खनिज का
लगभग
40
प्रतिशत
भंडार संचित है।
राज्य की अर्थव्यवस्था में खनिजों का खनन एक प्रमुख गतिविधि है
तथा इस दौरान प्रकृतिक तथा मानवीकृत दुर्घटना उतपन्न होती है।
 

राज्य के कई कोयला खदानों में आग लगी
हुई है तथा तीव्रता से इसका प्रसार हो रहा है। इनमे झरिया
,रामगढ़ आदि प्रमुख
क्षेत्र शामिल है। खनन में दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में खानो का धंसना
, मजदूरों  खनन से निर्मित गडढे
में गिर
  खनन
दौरान होने वाले प्रदूषण के कारन स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ प्रमुख है।
 

खनन दुर्घटना  निपटने हेतु इन
क्षेत्रों में कार्य करने वाले मजदूरों को प्रशिक्षित किये जाने के साथ साथ
  खनन के धँसाव के समय
त्वरित राहत प्रणाली को विकसित किये जाने की आवश्यकता है । साथ ही मजदूरों को खनन
के दौरान उतपन्न प्रदूषको के प्रति जागरूक करते हुए मॉस्क के प्रयोग हेतु
प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है।
 

 

हाथियों का आक्रमण 

 

हाथी झारखण्ड का  है राजकीय पशु है  तथा राज्य में इनकी
संख्या काफी ज्यादा है।
 
राज्य
के पलामू
, दुमका, सारंडा, हजारीबाग,
दलमा आदि के जंगलों
में सर्वाधिक हाथी पाए जाते है।
राज्य में आये दिन जंगली हाथी के आक्रमण की घटना
सुनने को मिलती है
, को
बासव क्षेत्र के जन -जीवन की एक प्रमुख समस्या है।
 

हाथियों के आक्रमण का प्रमुख कारण इनके
प्रकृतिक आवासों में मानव का हस्तक्षेप है।
  जंगलो में मानव हस्तक्षेप में वृद्धि के
कारण जहाँ एक और हाथीओ को ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचने का रास्ता उपलब्ध हुआ है
वही वनों के कटाव ने इन्हे अपने प्राकृतिक आवास से पलायन हेतु मजबूर किया है।
 

इसके अतिरिक्त सुगंधित महुआ फूलों की  आकर्षित होना हाथियों
के आक्रमण का एक प्रमुख कारण है।
  हाथियों के आक्रमण की समस्या राज्य के खूँटी, सिमडेगा, गुमला, लातेहार, पलामू, छात्र, हजारीबाग आदि जिले
में पायी जाती है।
  हाथियों
के आक्रमण से बचाओ हेतु सर्वप्रथम लोगो को जागरूक किये
  आवश्यकता है ताकि लोग
हाथियों के प्रकृतिक आवासों
  हस्तक्षेप करना बंद करें। हाथियों के आक्रमण के पश्चात्य कई
गाँवों ढोल – नगाड़ो की आवाज
, आज तथा मिर्च की गंध द्वारा उन्हें भागने का प्रयास किया जाता
है।
 

ये पार्ट –है और अगले पार्ट – में हम पढ़ेंगे की झारखण्ड सरकार द्वारा कौन – कौन से कार्य किये गए है
इन आपदाओं के रोक थाम के लिए या भविष्य में और क्या प्रयास किये जायेंगे धन्यवाद !

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