Monday, June 17, 2024
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John Stuart Mill’s Freedom Theory

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जॉन स्टुअर्ट मिल का स्वतंत्रता  सिद्धांत 

नाम:-
जॉन स्टुअर्ट मिल

जन्म:- 20 मई 1806 ईस्वी लन्दन        

पिता:-
जेम्स मिल


J.S Mill जिसे हम जॉन स्टुअर्ट मील के नाम से जानते है। लिबर्टी या
स्वतंत्रता संबंधी धारणा से सबंधी है।
 J.S Mill को एक उदारवादी चिंतन  के रूप में याद किया जाता है और आज भी उनका यह स्थान असुन बना हुआ है।  स्वतंत्रता को उन्होंने व्यकितत्व का
प्राण तत्व माना था
 J.S Mill ने स्वतंत्रता की जिस प्रकार से पुष्टि
की है उस कारण
 J.S Mill को स्वतंत्रता का देवदूत भी कहा गया है। 
J.S Mill 
के
सवतंत्रता संबंधी विचारो का प्रतिपादन
 On Liberty नामक पुस्तक में किया गया है। यह पुस्तक 1859  में प्रकासित हुई थी।  जिसमे व्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बहोत
अधिक महत्व दिया गया है और आज इतने वर्षो के बाद भी जो उनके विचार है उसका महत्व
और सार्थकता
 आज भी बना हुआ है। स्वयं J.S
Mill  
ने भी
अपनी पुस्तक की भूमिका में भविष्यवाणी की थी।
 आगे आने वाले वर्षो में इस सिद्धांत का
महत्व बहोत अधिक बढ़ जायेगा।
 

 J.S Mill द्वारा स्वतंत्रता की व्यख्या तथा उसका
समर्थन करने के पीछे अनेक ऐतिहासिक का कारण रहे थे।
 19वी शताब्दी के मध्य में इंग्लैण्ड के
राजनितिक परिस्थितियां इस भाँति विकसित हुई थी।
 जिसके लिए ऐसे सिद्धांत की आवश्यकता थी
जिसकी
 पूर्त J.S Mill की विचारो ने की थी। 19वी शताब्दी के मध्य कालीन में इंग्लैण्ड में
क्रेंद्रिय सरकार की
 शक्ति निरंतर बढ़ रही थी। इस काल में मताधिकार के विस्तार के लिए
तथा शिक्षा के प्रचार – प्रसार के
 स्थानीय स्वशासन को पुनः जीवित करने के
लिए सक्रीय प्रयास किया
 रहा जा था। 

 

संक्षेप
में कहा जाए तो
  काल में राजनितिक नियंतरण करने का दायरा
भी बढ़ते जा रहा था। राज्य द्वारा बनाई जा रही कानून को एक प्रकार से कहा जा सकता
है की भरमार हो गया था।
 साथ ही साथ व्यक्ति का  स्वतंत्रता का दायरा  भी सिमित हो रही थी। श्रमिक वर्ग  राजनितिक में भागीदारी दिलाने के लिए चार्टिस्ट आंदोलन सक्रीय हो रहा था जिसके परिणाम स्वरुप 1832  का सुधार अधिनियम ब्रिटिश संसद में पारित
किया गया था।

 

यदि हम J.S
Mill 
के
स्वतंत्रता सम्बंधित विचार
  महत्वो को समझना चाहे तो उन्होंने स्वतंत्रता का व्यक्ति तथा समाज के जो महत्व रहे है।
उसे उसने स्पष्ट करने का कार्य किया है।
 स्वतंत्रता से एक और व्यक्तियों से बना समाज भी उतना ही उन्नत होता है ऐसा J.S Mill का मानना था। J.S
Mill
यह भी
कहते
 है  की संक्रिण मानसिकता वाले लोग कभी भी महान  समाज का निर्माण नहीं कर सकते है। स्वतंत्रता व्यक्ति के लिए भी उतना ही उपयोगी है जितना की यह समाज  के लिए। व्यक्ति के लिए क्यों स्वतंत्रता की आवश्यक है? इसका स्वरूप क्या होना चाहिएतथा इसके सम्बन्ध में भी  विचार व्यक्त किये है।  J.S
Mill 
के लिए
स्वतंत्रता का अर्थ अपनी ईच्छा अनुसार कार्य करना तथा अपने तन – मन का सर्वोच्च
स्वामी होना है स्वतंत्रता के माध्यम से ही
 व्यक्ति अपनी संभाविय शक्तियों का पुर्ण
एवं अधिकतम सामंजस्य पुर्ण विकास करता है।
  J.S
Mill  
का यह भी
मानना था की स्वतंत्रत व्यक्ति
 के व्यक्तित्व के पूर्णतम विकास का आधार है। और व्यक्ति को वो आधार नहीं मिलने पर
उसका जीवन निरर्थक बन जाता है।
 स्वतंत्र चिंतन तथा व्यवहार से समाज  विभिन्नता आएगी ऐसा उनका मानना था
सामाजिक विकास के
  ध्यान में रखते हुए  J.S
Mill 
यहाँ तक
कहते है की
  ऐसे लोग जो अपने तरीके से समाज में कार्य करना चाहते है।  अथवा चिंतन की इस स्वतंत्रता चाहते है तो
यह समाज के
  घातक साबित होता है।  स्वतंत्रता के समुचित दायरे की व्यख्या
करते हुए।
 Mill  इसके तीन पक्ष स्वीकार करते है।
स्वतंत्रता का पहरा – दायरा व्यक्ति की चैतन का आंतरिक दायरा है। जिसकी यह माँग है
कि व्यक्ति को अंत करण की पूर्णतम स्वतंत्रता हो जिससे अपने विचारो और भावो की
स्वतंत्रता हो तथा व्यवहारिक मननशील तथा धार्मिक विषयो में अपना मत तथा मनो भावो
की स्वतंत्रता हो।
 

 J.S Mill का यह मानना था की स्वतंत्रता का दुसरे दायरे व्यक्तियों के रुचियों तथा उसके जीवन संचालन की
योजना से सम्बंधित है वह ये भी कहते है की स्वतंत्रता सिद्धांत की यह मांग है कि
हमे अपनी रुचियों कार्यो को करने वह अपने चरित्र अनुसार करने वह योजना बनाने की
तथा अपनी ईच्छा अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसी प्रकार उन्होंने
यह भी कहा है की जो तीसरा दायरा है वह
  मनुष्य को किसी भी उदेश्य के लिए संगठित  सवतंत्रता है किन्तु उसके साथ यह शर्त भी
है की उससे दुसरो कि हानि हो।
  मत अभि  व्यक्ति के संदर्भ में भी बात करते है  J.S
Mill 
का यह
द्रिढ़ विश्वास था की वह किसी विषय पर उसके मत तथा अभिव्यक्ति के बाद स्वतंत्रता
होनी चाहिए।
  प्रत्येक व्यक्ति को अपना मत व्यक्त करने  अधिकार होना चाहिए।  चाहे वह मत दूसरे के दृष्टि में सही या
गलत हो। समाज के अनेक परम्पराओं का पक्ष ही ले व्यक्ति इसके लिए स्वतंत्र है कि वह
बुरा मने।
  J.S Mill के व्यक्ति के मध्य स्वतंत्रीय तथा मत
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबंध समर्थन में अनेक तर्क प्रस्तुत किये है मिल के
अनुसार स्वतंत्रता व्यक्ति का नैतिक पक्ष प्रबल करता है विचारों की विविधता से
समाज में मौलिक को विकसित
  अवसर भी प्राप्त  होता है।  J.S
Mill 
के
अनुसार जो व्यक्ति दूसरे मत को दबाना चाहते है वह दूसरे के मत
  असत्य तथा अपने मत को एक मात्र सत्य  मानने की भुल कर बैठते है। वह अपने – आप को अभ्यार्थ मान बैठते है।  उन्हें यह अधिकार नहीं है कि किसी प्रश्न
पर वे सम्पूर्ण मानव जाती के लिए निर्णय करे।
 

 

 J.S Mill का यह भी मानना है व्यक्ति की स्वतंत्रता
को दो पक्षों के आधार पर इसकी विवेचना की जा सकती है।
 

 

पहला
पक्ष :-
व्यक्ति
की विचारों
 की स्वतंत्रता का है जिसका स्पष्टीकरण हम लोगो ने पहले ही इसके संदर्भ में
चर्चा कर लिया है।
 

दुसरे
पक्ष :-
व्यक्ति  कार्यो की स्वतंत्रता का है। कार्यो की
स्वतंत्रता विचारों की स्वतंत्रता
  की पुरक हो विचारो की सकार अथवा व्यवहारिक
रूप
  लिए कार्यो को स्वतंत्रता नितांत आवश्यकता है अन्यथा विचारो कि स्वतंत्रता निरंतर रह जाती है।  

 J.S Mill ने स्वतंत्रता सबंधी अपने विचार को इस  प्रकार से व्यक्त किया है की समाज के
अन्य सदस्यों
 के प्रति अश्लीलता,
अभद्रता,
अनैतिकता
का कार्य करना ऐसे संगठनों का निर्माण करना जिससे समाजिक हित की हानि हो। इत्यादि
ऐसे कार्यो से
 जो सभी लोगो समाज में रहते है। उन्हें दूर रहना
चाहिए। लोगो को एक दुसरे के प्रति अपना व्यवहार अच्छा रखना चाहिए और साथ ही साथ
स्वतंत्रता से सम्बंधित ऐसे कार्य करना चाहिए की लोग एक दूसरे के अधिकारों का हनन
नहीं करे और ऐसे विचार व्यक्त करने चाहिए कि स्वतंत्रता के ही सर्वोपरि स्थान समाज
में प्राप्त हो।
 

 J.S Mill की स्वतंत्रता की धारणा के संदर्भ में हम
कह सकते है कि यह पहलु रहा था। जिसमे हम स्वतंत्रता का सिद्धांत व्यक्ति की गरिमा
कि और ले जाने का और उसको समझने का कार्य करता है।
 J.S
Mill 
के विचार
ने उदारवाद लोकतंत्रवाद
 और व्यक्तिवाद के सिद्धांत को पुष्ट करने
का कार्य
 भी किया था।  J.S Mill के पुर्व जितने भी विचारक रहे है उन्होंने भी स्वतंत्रता के विषय में जरूर
बात किया है। लेकिन
  J.S Mill ने स्वतंत्रता को आध्यात्मिक अर्थ प्रदान
करने का कार्य किया था।
  उसने स्वतंत्रता के अर्थ को  गंभीर और व्यापक बनाते हुए।  उसे व्यक्तित्व की मौलिकता के साथ में
जोड़ने का भी कार्य किया था।
  उहोंने  स्वतंत्रता कि धारणा के साथ में एक ऐसे
समाजिक सहिषुणता की बात भी की है जिससे आगे आने वाले समय में वह उदारवादी
विचारधारा का आधार भी बनने का कार्य भी किया था।
  हालाँकि कुछ आलोचक जो है एवं 
J.S Mill 
के
स्वतंत्रता की धारणा को नकारात्मक भी बताते है उन्होंने जो आलोचक है।
 उनका कहना है की 
J.S Mill 
के
स्वतंत्रता के सिद्धांत की बहोत बड़ी दुर्बलता रही है कि वह व्यक्ति की स्वतंत्रता
को देवदुत किन्तु उसकी
 स्वतंत्रता की धारणा खोखली रही है राज्य के नियंत्रण
तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता के बिच कोई
 स्वाभविक विरोध नहीं होता है ऐसा आलोचको
का मानना है और इन्ही आधारों पर आलोचक जो है।
  वो  J.S Mill के सिधान्तो को खोखली स्वतंत्रता भी कहते
है। अमुर्त व्यक्ति की पुजारी बताते है और
  J.S Mill स्वतंत्रता की धारणा को एक अति तक खिंच
ले जाने
 के तौर पर भी व्यख्या करते है।  J.S Mill की स्वतंत्रता की धारणा का आलोचना भले ही की गई हो।  लेकिन फिर भी 19वी  शताब्दी  परिस्तिथियों  को नहीं भूलना चाहिए। जिनके संदर्भ में
उसने अपना स्वतंत्रता सबंधी विचार सभी लोगो के समक्ष व्यक्त किया था।
  उस समय के अनुसार कहा जा सकता है की जो 
J.S Mill 
ने विचार
व्यक्त थे
  वो जरूर 19वी शताब्दी के समज को प्रभावित करने का
कार्य किया था।
   

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