Tuesday, February 27, 2024
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प्रथम आंग्ल- मैसूर युद्ध (1767-1769)

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-1769) भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसमें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मैसूर सुल्तान टिपू सुल्तान के बीच युद्ध हुआ था। यह युद्ध दो बार लड़ा गया – पहली बार 1767-1769 और 1780-1784 में।

प्रथम आंग्ल – मैसूर युद्ध अंग्रेजों और हैदर अली के मध्य हुआ था। निजाम, मराठे एवं अंग्रेज हैदर के विरुद्ध एक त्रिगुट संधि में सम्मिलित हुए। हैदर ने अपनी कूटनीतिक सूझ – बूझ से इस त्रिकुट संधि को भंग करने का प्रयास किया। उसने मराठों को धन देकर और निजाम को प्रदेश का प्रलोभन देकर अपनी और मिला लिया और फिर कर्नाटक पर आक्रमण किया। अंग्रेजों की प्रारंभिक सफलता के कारण निजाम पर आक्रमण किया। अंग्रेजों की प्रारंभिक सफलता के कारण निजाम पुनः अंग्रेजो की और चला गया। हैदर अली ने उत्साहपूर्वक लड़ते हुए 1768 ईस्वी में मंगलोर पर अधिकार कर लिया।

कारण

युद्ध के पीछे मुख्य कारण थे भारतीय इतिहास में सक्रिय रूप से शासित एक महत्वपूर्ण भू-भाग, मैसूर राज्य, के तेजस्वी और सशक्त शासक हैदर अली का आक्रमणवादी विस्तारवादी होना था। वह बहुत ही उच्च बुद्धिमान थे और उन्हें ब्रिटिश सत्ता का भय था। उन्होंने भीतर के कुछ क्षेत्रों में व्यापार की जरूरत को पूरा करने के लिए ब्रिटिश के साथ दोस्ती की कोशिश की थी, लेकिन यह संबंध बाद में खराब हो गए।

मद्रास एवं कर्नाटक के बीच मैसूर सिमा विवाद दक्षिण भारत अरकाट का क्षेत्र जिसको लेकर मराठों के साथ हैदर का युद्ध चलकर था जिसमे अंग्रेज हस्तक्षेप कर रहे थे। प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध में अंग्रेजो की तरफ से बम्बई से कर्नल वुड तथा मद्रास की तरफ से जोसेफ स्मिथ ने हैदर के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह रही की हैदर अली ने मद्रास के क्षेत्र में अंग्रेज को न केवल पराजित किया। अपितु अंग्रेजों को मद्रास की संधि करने के लिए बाध्य किया। मार्च, 1769 ई. में उसकी सेनाएं मद्रास तक पहुंची थी। अंग्रेजों ने विवश होकर हैदर अली की शर्तो पर 4 अप्रैल, 1769 को ‘मद्रास की संधि ‘ की।

परिणाम

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के परिणामस्वरूप, हैदर अली के साम्राज्य को विस्तारित करने की योजना ब्रिटिश सेना के जरिए रुक गई। हालांकि, यह युद्ध बाद में अधिक विस्तृत युद्ध की भूमिका निभाने वाले दूसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-1784) की तैयारी का एक पहला अध्याय था, जिसमें युद्ध के दौरान टिपू सुल्तान ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ दृढता से लड़ते हुए अपनी शासनकाल को चुनौती दी।

यह युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मैसूर सुल्तानी साम्राज्य के बीच राजनीतिक और सामर्थ्यिक संघर्ष का परिणाम था और बाद में आने वाले घटनाओं को प्रभावित करता रहा।

 

 

 भारत से बहार हुए क्रांतिकारी गतिविधियाँ 

कांतिकारियों ने भारत के अलावा विदेशो में भी कई स्थानों पर क्रांतिकारी गतिविदियों को अंजाम दिया। इसमें से कुछ स्थान में  भारत से बहार हुए क्रांतिकारी गतिविधियाँ। 

कांतिकारियों ने भारत के अलावा विदेशो में भी कई स्थानों पर क्रांतिकारी गतिविदियों को अंजाम दिया। इसमें से कुछ स्थान/देश निम्नानुसार है – इंग्लैण्ड लंदन में क्रांतिकारी गतिविधियों के नेतृत्व की बात करे तो मुख्यतया श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, मदनलाल ढींगरा एवं लाला हरदयाल ने किया था। श्यामजी कृष्णवर्मा ने 1905 में भारत स्वशासन नमक एक समिति की स्थापना की, जिसे  ‘इंडियन  हाउस’   के नाम से जाना जाता है। फरवरी, 1905 में लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने भारत के लिए स्वशासन की प्राप्ति के उदेश्य से इंडियां होमरूल सोसाइटी की स्थापना की। सोसाइटी द्वारा इंडियन हाउस की आधारशिला रखने तथा श्री वर्मा द्वारा ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट ‘ नमक पत्र के प्रकाशन के साथ ब्रिटेन में भारतीय राष्ट्रिय क्रांतिकारी आंदोलन की नींव पड़ी। 

फ़रवरी, 1905 में लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने ‘इंडियन होमरूल’  सोसाइटी की स्थापना की.  यहा से एक समाचार- पत्र ‘ द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ का प्रकाशन भी प्रारंभ किया।  लंदन में सरकारी तंत्र के विशेष सक्रीय होने के कारण  श्यामजी वहाँ से पेरिस और अंततः जेनेवा चले गए।  

श्यामजी कृष्णा के बाद इंडिया हाऊस का कायभार विनायक दामोदर सावरकर ने संभाला।  यही सावरकर ने ‘1857 ‘ का ‘स्वतंत्रता संग्राम ‘ नमक प्रशिद्ध पुरस्तक लिखी।  उन्होंने मैजिनी की आत्मकथ का मराठी में अनुवाद भी किया। 1909  में मदनलाल ढींगरा ने  कर्नल विलियम कर्जन वैली की  हत्या कर दी।  ढींगरा को भी गिरफ्तार कर फांसी में चढ़ा दिया गया। 13 मार्च 1910 को नसिक षड्यंत्र केस में सावरकर जी को गुरफ्तार कर  लिया गया तथा उन्हें काले पानी की सजा दी गयी। 

अमेरिका तथा कनाडा :- संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा में क्रांतिकारी सेन गतिविधियों को लालहरदयाल  ने संभाला था। 1 नवम्बर 1913 को लाला हरदयाल ने ग़दर पार्टी की स्थापन की इसकी अन्य शाखाएं भी थी। ग़दर पार्टी की स्थापना 21 अप्रैल, 1913 को ब्रिटिश सरकार से मुक्ति हेतु  भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने के उदेश्य से की गई थी। इसे अमेरिका एवं कनाडा बसे  भारतीयों द्वारा गठित किया गया था।  पार्टी का मुख्यलय सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका में स्थित था। ग़दर दाल ने 1857 के विद्रोह की समृति में ‘ग़दर’ नमक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन किया।  

जर्मनी :- प्रथम विश्वयुद्ध के समय इंग्लैंड तथा जर्मनी के आपसी सबंध काफी तनावपूर्ण होने लगे और जिसके कारण जितने भी क्रांतिकारी कार्यकारण जितने भी कार्यकर्ता थे वे सभी जर्मनी आये और जर्मनी को अपना केंद्र बना लिए। वीरेंद्र चट्टोपाध्याय बर्लिन को अपनी गतिविधियों का केंद्र बना लिया। 

ग़दर पार्टी  :- इसकी स्थापना लाला हरदयाल ने 1913 में USA के सेंट फ्रांसिस्को में किया।  यह एक क्रांतिकारी संगठन था। इसे अमेरिका एवं कनाडा में बसे  भारतीय द्वारा गठित किया गया था।  पार्टी का मुख्यालय सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका में स्थित था।  वर्ष 1913 में सोहन सिंह भकना ने ‘एसोसिएशन ऑफ़ हिंदुस्तानी वर्कर्स ऑफ़ पैसिफिक कोस्ट’ नमक संस्था की स्थापना की।  इस संस्था ने ‘ग़दर ‘ नामक एक अखबार निकला, जिससे इस संस्था का नाम भी ‘ग़दर पार्टी ‘ पड़ गया। लाला हरदयाल इस संस्था के मनीषी पथ – प्रदर्शक थे। ग़दर पार्टी के सदस्यों में रामचंद्र, बरकतुल्ला, रास बिहारी बोस, राजा महेंद्र प्रताप, अब्दुल रहमान, मैडम भीकाजी कामा, भाई परमानंद, करतार सिंह सराभा तथा पंडित काशीराम प्रमुख थे। 

कामागाटा मारु (1914) गुरुदत्त सिंह ने कामागाटा मारु नमक जापानी जहाज को भाड़े पर लिया और कुछ भारतीय को कलकत्ता से लेकर कनाडा की और निकल गये किन्तु कनाडा सरकार ने अंग्रेजों के दबाव में आकर यह घोषणा किया की बैकुअर बंदरगाह पर उसी जहाज को रुकने दिया जायेगा जो रास्ते  में बिना कही रुके आया है किन्तु कामागाटामारू जहाज सिंगापूर में रुका था।  अन्तः कनाडा सरकार ने उस जहाज को बैकुअर बंदरगाह पर रुकने नहीं दिया।  अतः जहाज वापस कलकत्ता बंदरगाह लौट आया।  जब ये क्रांतिकारी वापस कलकत्ता के बजबज बंदरगाह पर पंहुचे तो अंग्रेजों और इनके बिच गोलीबारी शुरू  गई इस घटना को कामागाटा मारु की घटना कहते है। 

भीकाजी रुस्तम कामा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की समर्थक थी।  उन्होंने यूरोप एवं अमेरिका से क्रांति का संचालन किया। वर्ष 1907 में इन्होने स्टुटगार्ट (जर्मनी ) की अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस में भाग लिया, जहां  इन्होंने प्रथम भारतीय झंडे को फहराया जिसकी डिजाइन इन्होने स्वयं वी. डी. सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ मिलकर संयुक्त रूप से तैयार किया था। भारतीय क्रांति की माँ/जननी के रूप में भी जाना जाता है। 

अंग्रेज अधिकारियों की हत्या – इंग्लैंड में अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के आरोप में मदनलाल ढींगरा तथा ऊधम सिंह को फांसी की सजा मिली थी।  ध्यातव्य है की मदनलाल ढींगरा ने 1 जुलाई, 1909 को लंदन में भारतीय राष्ट्रिय संघ की बैठक में भारत राज्य सचिव के सलाहकार कर्जन वायली तथा कावास को गोलियों से भून दिया था।  फलतः उन्हें फांसी की सजा दी गई।  ऊधम सिंह ने जलियावाला बाग़ में हत्या के अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार तत्कालीन पंजाब के गवर्नर माइकल ओ  डायर लंदन में मार्च, 1940 में हत्या कर दी थी, फलतः इन्हे भी फांसी की सजा हुई थी। 

हरिजन आंदोलन

परिचय

हरिजन शब्द का अर्थ है “हरि की जनता” या “भगवान की जनता”। यह शब्द राष्ट्रपति बी.आर. अम्बेडकर द्वारा दलित समुदाय के लिए प्रयुक्त किया गया था। हरिजन आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी।

हरिजन आंदोलन का आरंभ

हरिजन आंदोलन का आरंभ महात्मा गांधी द्वारा सत्याग्रह आश्रम में किया गया था, 85 साल पहले महात्मा गांधी ने हरिजन आंदोलन करते हुए 21 दिन तक उपवास किया था 1933 महात्मा गांधी ने आत्म-शुद्धि के लिए 21 दिन का उपवास किया और हरिजन आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए एक-वर्षीय अभियान की शुरुआत की। जो कि वार्डा, गुजरात, भारत में स्थित था। गांधीजी का आश्रम वहाँ स्थित था जहाँ से वह अपने आंदोलन और सत्याग्रह कार्यों को निर्देशित करते थे। इस आश्रम का स्थान वार्डा नदी के किनारे था, जिसे सचिन और पूर्वी महाराष्ट्र के बीच स्थित है। जिसे सचिन और पूर्वी महाराष्ट्र के बीच स्थित है।

हरिजन आंदोलन का एक प्रमुख पहलुओं में से एक था तात्कालिक जातिवाद और अस्पृश्यता के खिलाफ उत्कृष्ट समर्थन प्रदान करना। इसके बाद, भारतीय समाज में बदलाव लाने के लिए आराम से नहीं, सत्याग्रह, अनशन, और अन्य आंदोलनों के माध्यम से काम किया गया।

हरिजन आंदोलन ने भारतीय समाज में सामाजिक वर्गों के बीच समानता और न्याय की मांग को बढ़ावा दिया और दलितों को समाज में शामिल होने का मार्ग दिखाया। इस आंदोलन के प्रभाव से धीरे-धीरे भारतीय समाज में सामाजिक बदलाव हुआ और अनुसूचित जातियों को भी अधिकार मिले।

 

हरिजन आंदोलन के समय में, महात्मा गांधी के साथ कई नेता इस आंदोलन में शामिल थे और उन्होंने गांधीजी के साथ मिलकर दलितों के अधिकारों की रक्षा करने का कार्य किया। कुछ महत्वपूर्ण नेता इस आंदोलन के समय में शामिल थे:

  1. महात्मा गांधी: हरिजन आंदोलन के मुख्य नेता और प्रेरणा स्रोत थे, जिन्होंने अस्पृश्यता और जातिवाद के खिलाफ खुलकर आंदोलन किया।
  2. बी.आर. अम्बेडकर: बाबासाहेब अम्बेडकर, जो बाद में भारतीय संविधान के शिल्पकार भी थे, हरिजनों के अधिकारों की रक्षा के लिए गांधीजी के साथ काम किया।
  3. रवीन्द्रनाथ टैगोर: कवि और विचारक रवीन्द्रनाथ टैगोर भी हरिजनों के पक्ष में थे और उन्होंने इस आंदोलन का समर्थन किया।
  4. जवाहरलाल नेहरू: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व, नेताजी जवाहरलाल नेहरू भी हरिजनों के अधिकारों की प्रोत्साहना करते थे और गांधीजी के साथ मिलकर काम किया।

ये कुछ मुख्य नेता थे, लेकिन इस आंदोलन में भाग लेने वाले और समर्थन प्रदान करने वाले कई और नेता भी थे।

 

परिणाम 

  1. हरिजनों के अधिकारों का सुधार: हरिजन आंदोलन ने भारतीय समाज में हरिजनों के अधिकारों में सुधार करने का परिणाम दिया। संविधान में अधिकारों का सुरक्षित और समान वितरण हुआ, जिससे हरिजन समुदाय को समाज में अधिक समानता मिली।
  2. अस्पृश्यता के खिलाफ जागरूकता: आंदोलन ने अस्पृश्यता के खिलाफ जागरूकता बढ़ाई और समाज में जातिवाद के खिलाफ सक्रिय रूप से लोगों को जागरूक किया।
  3. आरक्षित स्थानों का स्थापना: आंदोलन ने अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित स्थानों की मांग को सही रूप से आगे बढ़ाया, जिससे उन्हें शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में समान अवसर प्राप्त हुए।

प्रभाव 

  1. समाज में सामाजिक बदलाव: हरिजन आंदोलन ने भारतीय समाज में सामाजिक बदलाव लाने का कारण बना। जातिवाद और अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ते हुए, यह आंदोलन ने समाज को समृद्धि और समानता की दिशा में प्रेरित किया।
  2. विभाजन का समापन: हरिजन आंदोलन ने समाज में विभाजन को कम करने का प्रयास किया। यह दलित समुदाय को मुख्यस्तर से समाज में मिलाने का कारण बना और उन्हें सामाजिक स्थान में सुधारने का माध्यम प्रदान किया।
  3. संविधान में अधिकारों का शामिल होना: आंदोलन ने भारतीय संविधान में हरिजनों के अधिकारों का सुरक्षित रूप से शामिल होने में सहायक बना।
  4. भारतीय समाज में सामाजिक सद्भावना: यह आंदोलन ने समाज में सामाजिक सद्भावना को बढ़ावा दिया और सभी वर्गों के बीच समानता की भावना को मजबूत किया।

इन परिणामों और प्रभावों के साथ, हरिजन आंदोलन ने भारतीय समाज में सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान किया।

असहयोग आंदोलन/नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट (1920-1922)

नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन (1920-1922) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण चरण था, जो महात्मा गांधी द्वारा नेतृत्व किया गया था। इस मूवमेंट का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक अशांति पूर्ण, शांतिपूर्ण आंदोलन के माध्यम से भारतीय लोगों को समृद्धि और स्वतंत्रता की दिशा में जागरूक करना था।

यह मूवमेंट रोली शास्त्री के अच्छे अनुयायीयों द्वारा शुरू हुआ था जो जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) के खिलाफ आयोजित किया गया था। गांधी ने इसे एक नये स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में बदल दिया और इसे “नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट” कहा गया  जिसे असहयोग आंदोलन के नाम से भी जानते हैं।

 

मूवमेंट के कुछ मुख्य तत्व थे:

  1. स्वदेशी आंदोलन: इस मूवमेंट में भारतीय वस्त्र, खादी, और अन्य स्वदेशी उत्पादों का प्रचार-प्रसार किया गया और बाहरी वस्तुओं के बहिष्कार का पुनर्निर्माण किया गया।
  2. नॉनकॉऑपरेशन: गांधी ने लोगों से ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग न करने की कड़ी आपत्ति करने के लिए कहा और उन्हें अपनी उपयोगिता को बढ़ाने के लिए अधिकृत करने की प्रेरणा दी।
  3. हार्टाल और आंदोलन: भारत में विभिन्न क्षेत्रों में हार्टाल, प्रदर्शन और आंदोलन हुए जिसमें लाखों लोग भाग लेते थे।
  4. जलौसी यात्रा: इस मूवमेंट के अंतर्गत “जलौसी यात्रा” की गई, जिसमें भिक्षुकों ने शांतिपूर्ण रूप से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अभियान चलाया।
  5. छावनी बचाओ आंदोलन: 1921 में मालबार में हुए छावनी बचाओ आंदोलन में किसानों ने अपनी भूमि के खिलाफ विरोध प्रकट किया और इसमें नागरिक सत्याग्रह के रूप में शामिल हो गए।

हालांकि, 1922 में चौरी चौरा हत्याकांड के बाद गांधी ने मूवमेंट को विराम देने का निर्णय किया और नॉन-कॉऑपरेशन आंदोलन/ असहयोग आंदोलन को बंद कर दिया। इसमें हत्याएँ और हिंसा ने मूवमेंट को एक नए रुझान में ले जाने के लिए कहर डाल दिया था।

नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) एक महत्वपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम था जो 1920 से 1922 तक चला। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख पहलुओं में से एक था और महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुआ। इस मूवमेंट का मुख्य उद्देश्य था भारतीय लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सामंजस्यपूर्ण, शांतिपूर्ण आंदोलन के माध्यम से संजागरूक करना और उन्हें स्वतंत्रता की दिशा में जागरूक करना था।

नॉन-कॉऑपरेशन का अर्थ है “सहयोग न करना” या “को-सहयोग नहीं करना”। गांधी ने इस मूवमेंट के तहत भारतीय लोगों से यह कहा कि वे ब्रिटिश साम्राज्य की स्थिति को स्वीकार नहीं करें, उनके साथ सहयोग न करें, और उनके खिलाफ अमृत महोत्सव तक अपनी सामरिकता बढ़ाएं।

मूवमेंट के दौरान विभिन्न प्रकार के प्रतिवादी कदम उठाए गए, जैसे कि स्वदेशी आंदोलन, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, असहयोग और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ जन आंदोलन जैसे। हार्टाल, जलौसी यात्रा, और अन्य शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का भी आयोजन किया गया।

1922 में चौरी चौरा हत्याकांड के बाद, गांधी ने मूवमेंट को विराम देने का निर्णय किया क्योंकि उन्हें विरोधी आंदोलनों में हिंसा का आधार मिला और उन्होंने यह सोचा कि इससे आंदोलन की असली उद्देश्यों की कमी हो रही है।

नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन ने भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डाला और स्वतंत्रता संग्राम की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।

इस मूवमेंट के कुछ मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं:

  1. नागरिक आंदोलन: नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन ने भारतीय समाज में एक महत्वपूर्ण नागरिक आंदोलन की भूमिका निभाई। लोगों को सामूहिक रूप से जोड़ने का अवसर मिला और उन्हें स्वतंत्रता के लिए सामूहिक जिम्मेदारी महसूस होने लगी।
  2. स्वदेशी आंदोलन: इस मूवमेंट ने स्वदेशी आंदोलन को मजबूती से बढ़ाया और लोगों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया। वस्त्र, खादी, और स्वदेशी उत्पादों का प्रचार-प्रसार किया गया।
  3. जनसंघर्ष की भावना: नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन ने जनसंघर्ष की भावना को बढ़ावा दिया और लोगों में राष्ट्रभक्ति की भावना को उत्तेजना किया।
  4. विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार: लोगों को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की दिशा में प्रेरित किया और इसने ब्रिटिश उत्पादों के खिलाफ एक सामूहिक आंदोलन को बढ़ावा दिया।
  5. हिंसाहीन आंदोलन: इस मूवमेंट का मौखिक नारा था “सत्याग्रही असहयोगी बनो” जिससे स्पष्ट होता है कि गांधी ने हिंसाहीन आंदोलन का पुनर्निर्माण किया।
  6. ब्रिटिश सरकार को चुनौती: नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को एक नए स्तर से चुनौती दी और स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया।
  7. चौरी चौरा हत्याकांड: मूवमेंट के अंत में हुए चौरी चौरा हत्याकांड ने गांधी को आंदोलन को विराम देने के निर्णय पर मजबूर किया, लेकिन इसने भी भारतीय समाज को सहयोग और सामूहिक आंदोलन के महत्वपूर्णता का अहसास कराया।

इन प्रभावों के साथ, नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/ असहयोग आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नये चरण में ले जाने में मदद की और लोगों में स्वतंत्रता के प्रति उत्साह बढ़ाया।

नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन (1920-1922) में भारतीय राष्ट्रीय नेतृत्व ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

इस आंदोलन में शामिल होने वाले कुछ प्रमुख नेता निम्नलिखित थे:

  1. महात्मा गांधी: नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन के मुख्य नेता और आंदोलन के आचार्य थे। उन्होंने आंदोलन का आयोजन किया और लोगों को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ अमृत महोत्सव तक स्वतंत्रता के लिए आसन्न करने का आह्वान किया।
  2. जवाहरलाल नेहरु: जवाहरलाल नेहरु ने भी इस मूवमेंट में भाग लिया और गांधीजी के साथ मिलकर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।
  3. सरदार वल्लभभाई पटेल: सरदार पटेल ने भी इस मूवमेंट में भाग लिया और उन्होंने अपनी रूढ़िवादी विचारधारा के कारण अंग्रेजों के साथ को-सहयोग नहीं किया।
  4. अबुल कलाम आज़ाद: आज़ाद ने भी गांधीजी के साथ मिलकर इस मूवमेंट में भाग लिया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाई।
  5. सरोजिनी नायडू: सरोजिनी नायडू ने भी नॉन-कॉऑपरेशन मूवमेंट/असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और महिलाओं को भी आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।

ये नेता अपनी भूमिका में विभिन्न क्षेत्रों में आंदोलन को मजबूती और व्यापकता प्रदान करने में सक्रिय रूप से योगदान करते रहे।

खिलाफत आंदोलन

“खिलाफत आंदोलन” एक ऐतिहासिक घटना थी जो 1919 से 1924 तक भारत में हुई थी। यह आंदोलन मुस्लिम समुदाय के बीच हुआ था और इसका मुख्य उद्देश्य था ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध में तुर्की के खिलाफत (खिलाफत, इस्लामिक सम्राट का पद) की रक्षा करना और उसकी सुरक्षा के लिए जिहाद की घोषणा करना था।

खिलाफत आंदोलन की शुरुआत में, मुस्लिम नेता मौलाना मोहम्मद अली और मौलाना शौकत अली की अगुआई में हुआ था। इस आंदोलन का समर्थन महात्मा गांधी ने भी किया और उन्होंने खिलाफत आंदोलन को अपने सत्याग्रह आंदोलन के साथ मिलाकर चलाया। गांधीजी का मुख्य उद्देश्य था हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ मिलकर समर्थन देना।

हालांकि, खिलाफत आंदोलन ने अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफलता प्राप्त नहीं की, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण समयको दर्शाता है जब हिन्दू और मुस्लिम समुदायों ने एक साथ आंदोलन किया और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक सामंजस्यपूर्ण साझेदारी की दिशा में कदम बढ़ाया।

खिलाफत आंदोलन का कारण बहुत प्राधिकृत्य था और इसमें कई मुख्य कारण शामिल थे:

तुर्की की स्थिति: पहला मुख्य कारण था तुर्की की खिलाफत की स्थिति। विश्व युद्ध पराजय के बाद, तुर्क सल्तनत को बर्खास्त किया गया और खिलाफत को भी समाप्त कर दिया गया। इससे मुस्लिम समुदायों में आक्रोश उत्पन्न हुआ और उन्होंने इसके खिलाफ प्रतिक्रिया दिखाई।

खिलाफत की रक्षा का आदान-प्रदान: खिलाफत को मुस्लिमों ने इस्लामिक सम्राट की स्थानीय संरक्षण के रूप में देखा था और उन्होंने इसकी रक्षा के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उठाये जाने का आदान-प्रदान किया।

हिन्दूमुस्लिम एकता: खिलाफत आंदोलन का एक और महत्वपूर्ण पहलु था हिन्दू-मुस्लिम एकता की भावना को बढ़ावा देना। महात्मा गांधी ने इसे अपने सत्याग्रह आंदोलन के साथ जोड़ा और इससे एक सामंजस्यपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन की भावना उत्पन्न हुई।

आर्थिक असहायता: मुस्लिमों को मिलने वाली आर्थिक मुश्किलें भी इस आंदोलन के पीछे एक कारण थीं। विश्व युद्ध के बाद की आर्थिक स्थिति में सुधार होने की उम्मीद नहीं थी और इससे अनेक मुस्लिम असहायता में पड़ गए थे।

इन सभी कारणों से मिलकर, खिलाफत आंदोलन एक महत्वपूर्ण घटना बन गई जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने में मदद करने का प्रयास किया।

खिलाफत आंदोलन में कई मुख्य नेता और उनकी दलीलें शामिल थीं। यह आंदोलन मुस्लिम नेता मौलाना मोहम्मद अली और मौलाना शौकत अली के नेतृत्व में हुआ था। इसके अलावा, महात्मा गांधी ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया और उन्होंने अपने सत्याग्रह आंदोलन के साथ मिलाकर इसमें भाग लिया।

इस आंदोलन में शामिल होने वाले कुछ मुख्य नेता थे:-

मौलाना मोहम्मद अली: वे खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता थे और उन्होंने तुर्क सल्तनत और खिलाफत की रक्षा के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की थी।

मौलाना शौकत अली: वे भी एक मुख्य आंदोलन नेता थे और मौलाना मोहम्मद अली के साथ मिलकर इसमें सक्रिय रूप से शामिल थे।

महात्मा गांधी: गांधीजी ने भी खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया और इसमें भाग लिया। उन्होंने खिलाफत आंदोलन को अपने सत्याग्रह के साथ जोड़कर हिन्दू-मुस्लिम एकता की भावना को बढ़ावा देने का प्रयास किया।

इन नेताओं के साथ ही, अनेक हिन्दू और मुस्लिम नेता भी इस आंदोलन में शामिल हुए और इसके माध्यम से विशेषत: स्वतंत्रता संग्राम के साथ मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक सामंजस्यपूर्ण साझेदारी की भावना को बढ़ावा दिया।

“खिलाफत आंदोलन” भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय था जो 1919 से 1924 तक चला। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध में तुर्क सल्तनत और खिलाफत की सुरक्षा के लिए मुस्लिम समुदाय को एकत्र करना था। इसे मुस्लिम नेता मौलाना मोहम्मद अली और मौलाना शौकत अली के नेतृत्व में आयोजित किया गया था।

हिन्दू-मुस्लिम एकता: आंदोलन ने हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच साझेदारी की भावना को बढ़ावा दिया। गांधीजी ने भी इसे अपने सत्याग्रह के साथ जोड़ा और हिन्दू-मुस्लिम एकता को प्रोत्साहित किया।

स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणा स्रोत: खिलाफत आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भावना को बढ़ावा दिया और लोगों को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सामूहिक रूप से उठने के लिए प्रेरित किया।

असफलता: हालांकि, खिलाफत आंदोलन अंत में असफल रहा, क्योंकि तुर्क सल्तनत का समाप्त हो गया और युद्ध के पराजय के बाद ब्रिटिश सरकार ने खिलाफत को समाप्त कर दिया, लेकिन इसने स्वतंत्रता संग्राम को और भी मजबूती प्रदान की।

खिलाफत आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की राह में महत्वपूर्ण योगदान दिया और यह भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना बन गया।