Saturday, April 13, 2024
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 भारत से बहार हुए क्रांतिकारी गतिविधियाँ 

कांतिकारियों ने भारत के अलावा विदेशो में भी कई स्थानों पर क्रांतिकारी गतिविदियों को अंजाम दिया। इसमें से कुछ स्थान में  भारत से बहार हुए क्रांतिकारी गतिविधियाँ। 

कांतिकारियों ने भारत के अलावा विदेशो में भी कई स्थानों पर क्रांतिकारी गतिविदियों को अंजाम दिया। इसमें से कुछ स्थान/देश निम्नानुसार है – इंग्लैण्ड लंदन में क्रांतिकारी गतिविधियों के नेतृत्व की बात करे तो मुख्यतया श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, मदनलाल ढींगरा एवं लाला हरदयाल ने किया था। श्यामजी कृष्णवर्मा ने 1905 में भारत स्वशासन नमक एक समिति की स्थापना की, जिसे  ‘इंडियन  हाउस’   के नाम से जाना जाता है। फरवरी, 1905 में लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने भारत के लिए स्वशासन की प्राप्ति के उदेश्य से इंडियां होमरूल सोसाइटी की स्थापना की। सोसाइटी द्वारा इंडियन हाउस की आधारशिला रखने तथा श्री वर्मा द्वारा ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट ‘ नमक पत्र के प्रकाशन के साथ ब्रिटेन में भारतीय राष्ट्रिय क्रांतिकारी आंदोलन की नींव पड़ी। 

फ़रवरी, 1905 में लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने ‘इंडियन होमरूल’  सोसाइटी की स्थापना की.  यहा से एक समाचार- पत्र ‘ द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ का प्रकाशन भी प्रारंभ किया।  लंदन में सरकारी तंत्र के विशेष सक्रीय होने के कारण  श्यामजी वहाँ से पेरिस और अंततः जेनेवा चले गए।  

श्यामजी कृष्णा के बाद इंडिया हाऊस का कायभार विनायक दामोदर सावरकर ने संभाला।  यही सावरकर ने ‘1857 ‘ का ‘स्वतंत्रता संग्राम ‘ नमक प्रशिद्ध पुरस्तक लिखी।  उन्होंने मैजिनी की आत्मकथ का मराठी में अनुवाद भी किया। 1909  में मदनलाल ढींगरा ने  कर्नल विलियम कर्जन वैली की  हत्या कर दी।  ढींगरा को भी गिरफ्तार कर फांसी में चढ़ा दिया गया। 13 मार्च 1910 को नसिक षड्यंत्र केस में सावरकर जी को गुरफ्तार कर  लिया गया तथा उन्हें काले पानी की सजा दी गयी। 

अमेरिका तथा कनाडा :- संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा में क्रांतिकारी सेन गतिविधियों को लालहरदयाल  ने संभाला था। 1 नवम्बर 1913 को लाला हरदयाल ने ग़दर पार्टी की स्थापन की इसकी अन्य शाखाएं भी थी। ग़दर पार्टी की स्थापना 21 अप्रैल, 1913 को ब्रिटिश सरकार से मुक्ति हेतु  भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने के उदेश्य से की गई थी। इसे अमेरिका एवं कनाडा बसे  भारतीयों द्वारा गठित किया गया था।  पार्टी का मुख्यलय सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका में स्थित था। ग़दर दाल ने 1857 के विद्रोह की समृति में ‘ग़दर’ नमक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन किया।  

जर्मनी :- प्रथम विश्वयुद्ध के समय इंग्लैंड तथा जर्मनी के आपसी सबंध काफी तनावपूर्ण होने लगे और जिसके कारण जितने भी क्रांतिकारी कार्यकारण जितने भी कार्यकर्ता थे वे सभी जर्मनी आये और जर्मनी को अपना केंद्र बना लिए। वीरेंद्र चट्टोपाध्याय बर्लिन को अपनी गतिविधियों का केंद्र बना लिया। 

ग़दर पार्टी  :- इसकी स्थापना लाला हरदयाल ने 1913 में USA के सेंट फ्रांसिस्को में किया।  यह एक क्रांतिकारी संगठन था। इसे अमेरिका एवं कनाडा में बसे  भारतीय द्वारा गठित किया गया था।  पार्टी का मुख्यालय सैन फ्रांसिस्को, अमेरिका में स्थित था।  वर्ष 1913 में सोहन सिंह भकना ने ‘एसोसिएशन ऑफ़ हिंदुस्तानी वर्कर्स ऑफ़ पैसिफिक कोस्ट’ नमक संस्था की स्थापना की।  इस संस्था ने ‘ग़दर ‘ नामक एक अखबार निकला, जिससे इस संस्था का नाम भी ‘ग़दर पार्टी ‘ पड़ गया। लाला हरदयाल इस संस्था के मनीषी पथ – प्रदर्शक थे। ग़दर पार्टी के सदस्यों में रामचंद्र, बरकतुल्ला, रास बिहारी बोस, राजा महेंद्र प्रताप, अब्दुल रहमान, मैडम भीकाजी कामा, भाई परमानंद, करतार सिंह सराभा तथा पंडित काशीराम प्रमुख थे। 

कामागाटा मारु (1914) गुरुदत्त सिंह ने कामागाटा मारु नमक जापानी जहाज को भाड़े पर लिया और कुछ भारतीय को कलकत्ता से लेकर कनाडा की और निकल गये किन्तु कनाडा सरकार ने अंग्रेजों के दबाव में आकर यह घोषणा किया की बैकुअर बंदरगाह पर उसी जहाज को रुकने दिया जायेगा जो रास्ते  में बिना कही रुके आया है किन्तु कामागाटामारू जहाज सिंगापूर में रुका था।  अन्तः कनाडा सरकार ने उस जहाज को बैकुअर बंदरगाह पर रुकने नहीं दिया।  अतः जहाज वापस कलकत्ता बंदरगाह लौट आया।  जब ये क्रांतिकारी वापस कलकत्ता के बजबज बंदरगाह पर पंहुचे तो अंग्रेजों और इनके बिच गोलीबारी शुरू  गई इस घटना को कामागाटा मारु की घटना कहते है। 

भीकाजी रुस्तम कामा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की समर्थक थी।  उन्होंने यूरोप एवं अमेरिका से क्रांति का संचालन किया। वर्ष 1907 में इन्होने स्टुटगार्ट (जर्मनी ) की अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस में भाग लिया, जहां  इन्होंने प्रथम भारतीय झंडे को फहराया जिसकी डिजाइन इन्होने स्वयं वी. डी. सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ मिलकर संयुक्त रूप से तैयार किया था। भारतीय क्रांति की माँ/जननी के रूप में भी जाना जाता है। 

अंग्रेज अधिकारियों की हत्या – इंग्लैंड में अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के आरोप में मदनलाल ढींगरा तथा ऊधम सिंह को फांसी की सजा मिली थी।  ध्यातव्य है की मदनलाल ढींगरा ने 1 जुलाई, 1909 को लंदन में भारतीय राष्ट्रिय संघ की बैठक में भारत राज्य सचिव के सलाहकार कर्जन वायली तथा कावास को गोलियों से भून दिया था।  फलतः उन्हें फांसी की सजा दी गई।  ऊधम सिंह ने जलियावाला बाग़ में हत्या के अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार तत्कालीन पंजाब के गवर्नर माइकल ओ  डायर लंदन में मार्च, 1940 में हत्या कर दी थी, फलतः इन्हे भी फांसी की सजा हुई थी। 

नरम दल और गरम दल (Soft lentils and hot lentils)

 

 

नरम दल और गरम दल  दो तरह के विचारधारा  के विभिन्नता  से जनमी  एक सोच थी, जब भारत स्वतंत्रता में ब्रिटिश उपनिवेशों को खदड़ने के लिए विभिन्न दलों का गठन किया गया था। जिसमें कुछ व्यक्तियों द्वारा विशेष योगदान रहा था।  1885 -1905 तक कांग्रेस के इस चरण को उदारवादी के नाम से जाना जाता है क्योंकि इस चरण में आंदोलन का नेतृत्व मुख्यतया: उदारवादी नेताओं के हाथो में रहा। जिसमें दादा भाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, दिनशा वाचा, डब्ल्यू.सी बनर्जी, पी.आर.नायडू, आनंद चार्लु, रासबिहारी घोष, आर सी दत्, बदरुद्दीन तैयबजी, गोपाल कृष्ण गोखले, पंडित मदनमोहन मालवीय इत्यादि शामिल थे। इन नेताओं को कांग्रेस के प्रथम चरण का नेता कहा जाता था। इनकी विचारधारा अहिंसक प्रवृति वाली रही थी।  ये बिना किसी आंदोलन या बिना किसी हिंसक व्यवहार के आंदोलन करने  में विश्वास रखते थे। इनकी यह विशेषता इन्हे 20वी शताब्दी के प्रथम दशक में उभरने वाले नव – राष्ट्रीयवादियों  जिन्हें उग्रवादी कहते थे, और इनसे इन्हे पृथक करती है। 

 

 

 

नरम दल और गरम दल :- 1905 में जब कांग्रेस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में बनारस में सपन्न हुआ तो उदारवादियों एवं उग्रवादियों के मतभेद खुलकर सामने आ गये।  इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक ने नरमपंथियों की ब्रिटिश सरकार के प्रति उदार एवं सहयोग की नीति  की कटु आलोचना की।  तिलक की मंशा थी की स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन का पुरे बंगाल तथा देश के अन्य भागों में तेजी से विस्तार किया जाए, तथा अन्य संस्थाओं  को इस आंदोलन में सम्मिलित कर  इसे राष्ट्रव्यापी आंदोलन का स्वरुप दिया जाये, जबकि उदारवादी इस आंदोलन को केवल बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते थे दोनों दलों में  विचार के कारण मदभेद होने लगा, जिसके परिणाम स्वरुप अंततः बिच का रास्ता निकलते हुए एक मध्यमार्गी प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीतियों तथा बंगाल विभाजन की आलोचना की गयी तथा स्वदेशी बहिष्कार आंदोलन का समर्थन किया गया। इससे कुछ समय के लिये कांग्रेस का विभाजन टल गया।

 

 

 

 

 

 

 

दिसम्बर 1906 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ।  इस अधिवेशन में तत्कालीन साम्प्रदायिक दंगों एवं क्रांतिकारी आंतकवाद तथा गरमदल के लाला लाजपात राय, बिपिन चंद्रपाल और बाल गंगाधर तीलक थे। की लोकप्रियता में वृद्धि के कारण गरमदल की लोकप्रियता का प्रभाव लोंगो में हो गयी थी. इस अधिवेशन में उग्रवादी, बाल गंगाधर तिलक या लाला लाजपत राय अध्यक्ष बनाना चाहते थे, जबकि नरम दल से रासबिहारी घोष का नाम प्रस्तावित किया।मतभेद बढ़ने के कारण 1907 के कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस में विभाजित हो गयी, गरम दल वाले वन्देमातरम को राष्ट्र गान बनाना चाहते थे और नरम दाल वाले जन- गन- मन के समर्थन में थे । यही सब आपसी मदभेद के कारण हमें दो प्रकार के विचार वाले दलों को भारत के राजनितिक में देखने को मिलता है। जिसे नरम दल और गरम दल  के नाम से वर्तमान में जाना जाता है। 

31 अक्टूबर, 1920 को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) (All India Trade Union Congress (AITUC) on October 31, 1920)

 

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस का इसलिये गठन किया गया था क्योंकि हमारे देश में मजदूरों ने भी आंदोलन संचालित  किया था जिसमे मजदूरों द्वारा पहला आंदोलन अहमदाबाद मजदुर मिल का आंदोलन था। जिसमें इनकी सहायता महात्मा गाँधी जी ने किया था और इससे मजदूरों के भुकतान राशि की बड़ा दी गई थी। मजदूरों की आंदोलन में बढ़ती भागीदारी को देखकर इनको भी राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनाने के उदेश्य से ऐसा विचार इनके दिमाग में आया,  मजदूरों को  संगठित  कर उन्हें भी राष्ट्रिय आंदोलन में सम्मलित करना इस संगठन का उदेश्य था।  इसे देश के वरिष्ठ नेता चितरंजन दास के सलाह पर 31 अक्टूबर, 1920  को ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना की गयी थी।   उस वर्ष (1920 ) के भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष, लाला  लाजपत राय को  एटक का  प्रथम अध्यक्ष तथा दीवान चमलाल जो इसके प्रथम नेता थे , जिन्होंने पूंजीवादी को साम्राज्य से जोड़ने का प्रयास किया।  उनके अनुसार ” साम्राज्यवाद एवं सैन्यवाद, पूंजीवाद की जुड़वा संताने होती है। 

 

 

 

 

गाँधी-इर्विन समझौता  सविनय अवज्ञा आंदोलन   डंडी यात्रा   नमक सत्याग्रह

गाँधी – इर्विन समझौता 5 मार्च, 1931

 

 
 
 
 

 

 

मुख्य उदेश्य :- भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के गया अधिवेशन (1922) में सारसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर  एटक की स्थापन का स्वागत किया गया था तथा साथ ही साथ इसकी सहायता के लिये एक समिति का गठन भी  किया गया।  सी. आर. दास ने सुझाव भी दिया की कांग्रेस द्वारा श्रमिको एवं किसानों   को राष्ट्रिय आंदोलन की प्रक्रिय में भागिदार बनाया जाना चाहिए और उनको  (श्रमिकों एवं किसानों ) समर्थन करना चाहिए। अगर कांग्रेस ऐसा नहीं करती है तो ये दोनों ही वर्ग राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा से पृथक हो जायेंगे।  इन बातो को सभी  राष्ट्रवादी  विचारधारा के  प्रमुख नेताओं जैसे :- जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, सी. एफ एंड्रूज, सत्यमूर्ति, जे. एम. सेनगुप्ता, सरोजिनी नायडू, वी. वी. गिरी, इत्यादि नेताओं ने भी ऑल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांगेस से निकट सबंध स्थापित करने का प्रयास किया।  अपनी स्थापन की प्रारंभिक वर्षो में ‘एटक’ ब्रिटेन  श्रमिक दल के सामाजिक एवं लोकतांत्रिक विचारो से काफी प्रभवित था। क्योंकि इस संस्था पर अहिंसा एवं वर्ग सहयोग जैसे गांधीवादी दर्शन के सिद्धांतो का भी गहरा प्रभाव था।  

 

गाँधी-इर्विन समझौता  सविनय अवज्ञा आंदोलन   डंडी यात्रा   नमक सत्याग्रह

गाँधी – इर्विन समझौता 5 मार्च, 1931

 

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